तालाब कहां बने और बरसात का पानी कैसे रुके—झाबुआ में इन सवालों पर गांव की टोली साथ बैठती है। शिवगंगा के जल-संरक्षण कार्यक्रम में स्थल चुनने से लेकर मिट्टी के तालाब बनाने तक सामूहिक श्रम की परंपरा हलमा का सहारा लिया जाता है।

संस्था के कार्यक्रम-विवरण के मुताबिक ग्राम इंजीनियरिंग प्रशिक्षण चार दिन का है। शिवगंगा और इंदौर के SGSITS के शिक्षकों ने इसका मॉड्यूल तैयार किया। गांव के प्रतिभागी जल-संरक्षण की योजना और मिलकर किए जाने वाले कामों की सूची बनाते हैं।

मिट्टी के तालाबों का काम सूखी गर्मियों में होता है। छोटे ढांचों में हैंडपंप रिचार्ज, बोरी बंधान और पहाड़ी ढलानों पर समोच्च खाइयां शामिल हैं। प्रशिक्षण में पौधरोपण और सामुदायिक वन मातावन को फिर सँवारने की बात भी आती है।

शिवगंगा के पुराने विवरण के अनुसार झाबुआ की हाथीपावा पहाड़ियों पर बड़े सामूहिक हलमा का आयोजन 2009 से किया जा रहा है। संस्था की इस पहल में स्थानीय परंपरा और पानी रोकने की तकनीकी समझ साथ काम करती हैं।

मुख्य बातें

  • ग्राम इंजीनियरिंग प्रशिक्षण में गांव अपनी जल-योजना बनाते हैं।
  • मॉड्यूल में इंदौर के SGSITS के शिक्षकों का सहयोग है।
  • तालाब के साथ छोटे जल-संरक्षण ढांचे भी बनाए जाते हैं।

स्रोत और संदर्भ

  1. शिवगंगा · Water Conservation ↗प्रकाशन-तिथि उपलब्ध नहीं
  2. शिवगंगा · Community Empowerment and Gram Engineering Camps ↗प्रकाशन-तिथि उपलब्ध नहीं
  3. शिवगंगा · Halma: community tradition and history ↗प्रकाशन-तिथि उपलब्ध नहीं

सार्वजनिक प्राथमिक स्रोतों पर आधारित संपादित लेख। स्रोत जाँच: 16 सितंबर 2026।

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