शासन की योजनाएं जब जरूरतमंद हितग्राहियों तक पहुंचती हैं तो वे केवल आर्थिक सहायता का माध्यम नहीं रहतीं, बल्कि परिवार की आजीविका और जीवन स्तर बदलने का जरिया बन जाती हैं। ऐसी ही कहानी है कटंगी विकासखंड के ग्राम कलगांव निवासी पशुपालक लेखीराम राहंगडाले की, जिनके लिए मुख्यमंत्री डेयरी प्लस योजना आर्थिक मजबूती का आधार बन गई है।लेखीराम के पास पहले देशी नस्ल की भैंस थी। इनसे दूध का उत्पादन बेहद कम होता था, जिसके कारण पशुपालन से पर्याप्त आमदनी नहीं हो पाती थी। परिवार की आय बढ़ाने के लिए वे बेहतर नस्ल के दुधारू पशु लेना चाहते थे, लेकिन आर्थिक संसाधनों की कमी उनके सामने बड़ी चुनौती थी। ऐसे समय में मुख्यमंत्री डेयरी प्लस योजना उनके लिए उम्मीद की किरण बनी। योजना के माध्यम से लेखीराम ने मुर्रा नस्ल की दो भैंसें खरीदीं। मुर्रा नस्ल की भैंसों से दूध उत्पादन बढ़ने के बाद उनकी आर्थिक स्थिति में भी सकारात्मक बदलाव आया। अब वे उत्पादित दूध का विक्रय कर हर माह करीब 10 हजार रुपए की शुद्ध बचत कर रहे हैं।

मुख्यमंत्री डेयरी प्लस योजना के तहत दो भैंसों की इकाई लागत 2 लाख 95 हजार रुपए निर्धारित है। इसमें शासन की ओर से 50 प्रतिशत अर्थात 01 लाख 47 हजार 500 रुपए का अनुदान दिया गया, जबकि हितग्राही का 50 प्रतिशत अंशदान 01 लाख 47 हजार 500 रुपए है।लेखीराम बताते हैं कि डेयरी व्यवसाय से प्राप्त होने वाली आमदनी से वे नियमित रूप से ऋण की राशि जमा कर रहे हैं। इसके बाद भी उनके परिवार के लिए हर माह लगभग 10 हजार रुपए की शुद्ध बचत हो रही है। इससे परिवार की आर्थिक स्थिति पहले की तुलना में बेहतर हुई है और पशुपालन को लेकर उनका विश्वास भी बढ़ा है।

लेखीराम के लिए मुर्रा नस्ल की भैंसें सिर्फ पशुधन नहीं, बल्कि परिवार की आय का मजबूत आधार बन गई हैं। पहले जहां देशी नस्ल की भैंसों से सीमित मात्रा में दूध मिलने के कारण पशुपालन से खास आय नहीं हो पाती थी, वहीं अब बेहतर नस्ल के पशुओं ने दूध उत्पादन और आमदनी दोनों को बढ़ाया है।लेखीराम कहते हैं कि डेयरी प्लस योजना ने उन्हें अपने पशुपालन व्यवसाय को आगे बढ़ाने का अवसर दिया है। दूध की बिक्री से होने वाली आमदनी से वे ऋण की किस्त चुकाने के साथ परिवार के लिए बचत भी कर पा रहे हैं। मुख्यमंत्री डेयरी प्लस योजना से मिली सहायता ने लेखीराम राहंगडाले जैसे पशुपालक के लिए पशुपालन को परंपरागत गतिविधि से आगे बढ़ाकर नियमित और लाभकारी आजीविका का माध्यम बना दिया है। आज उनकी मेहनत, बेहतर नस्ल के पशुधन और शासकीय योजना के सहयोग से परिवार की आर्थिक स्थिति में नया बदलाव दिखाई दे रहा है।